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India Speak Daily > Blog > धर्म > सनातन हिंदू धर्म > हंस और डिम्भक की कथा – भाग ७
सनातन हिंदू धर्म

हंस और डिम्भक की कथा – भाग ७

ISD News Network
Last updated: 2024/02/06 at 11:43 AM
By ISD News Network 62 Views 20 Min Read
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श्वेता पुरोहित। सुधर्मा-सभा में दुर्वासा आदि मुनियों का आगमन, श्रीकृष्ण का उनसे वहाँ आने का कारण पूछना, दुर्वासा का भगवान् की स्तुति एवं उपालम्भ पूर्वक उनके प्रश्न का प्रतिवाद करके अपनी दुर्दशा का वृत्तान्त सुनाना तथा भगवान् श्रीकृष्ण की हंस और डिम्भक के वधके लिये प्रतिज्ञा करना

वैशम्पायनजी कहते हैं – जो सबके ईश्वर और सर्वव्यापी हैं, जिनके नेत्र कमलदल के समान सुन्दर हैं, जो श्यामसुन्दर, पीताम्बरधारी, श्रीसम्पन्न, लटकते हुए लम्बे वस्त्रों और आभूषणों से विभूषित, मुकुटमण्डित और लक्ष्मी के अधिपति हैं, जिनके मस्तक पर काले – काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं, जो अव्यक्त, सनातनदेव, सम्पूर्ण कलाओं से युक्त, कलातीत एवं कल्याणमय हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण किसी समय सात्यकि आदि अन्य कुमारों के साथ क्रीडा-विहार में लगे हुए थे।

सुधर्मा-सभा के मध्यभाग में विराजमान हो सबका प्रिय करने वाले यादव शिरोमणि केशव कृष्ण सात्यकि के साथ गोल क्रीडा कर रहे थे। उस समय कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकि से यह कह रहे थे कि ‘यह पहला गोल मेरा है, तुम्हारा पीछे होगा’। उनके पार्श्वभाग में वसुदेव तथा उद्धव आदि प्रमुख यादव यथोचित स्थान पर बैठे थे। जैसे पूर्वकाल में भगवान् श्रीराम अपने सखा सुग्रीव के साथ क्रीडा-विहार करते थे, उसी प्रकार जब दूसरा व्यापार (कार्य) नहीं रहता, तब भूतात्मा भूत-भावन भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने सुहृदों के साथ मनोरञ्जन करते थे। उस दिन दोपहर के समय महाविष्णु स्वरूप अच्युत श्रीकृष्ण सात्यकि के साथ देर तक गोलक्रीडा कर के यादवों सहित उससे विरत हो गये।

जिन्हें द्वारपाल ने पहले भीतर आने से रोक दिया था और द्वारपर ही आदरपूर्वक बिठा रखा था, वे मुनि ‘यह भीतर प्रवेश करने का अवसर है’ ऐसा जानकर उस समय उस सभा में प्रविष्ट हुए। दीर्घकाल से तपस्या करने वाले उन शुद्धचेता यतियों ने तपोधन दुर्वासा को आगे करके यादवेश्वर श्रीकृष्ण का दर्शन किया, जो पहले गोलक्रीडा में आसक्त थे और उस समय भी जिनके हाथ में गोल मौजूद था। वे प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल नेत्रवाले श्रीविष्णु हरि एक नेत्र से सात्यकि को आनन्द प्रदान करते थे और दूसरे से उस गोलकी ओर देख रहे थे।

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इसी समय वे यति उनके सामने दिखायी दिये। वृष्णि-पालक कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकि, बलभद्र, वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन तथा अन्य सब यादव उन यतियों को देखकर बड़ी घबराहट में पड़ गये और शङ्कितचित्त होकर एक-दूसरे से पूछने लगे-‘यह क्या है? कैसी बात है ? वे यादव उन अद्भुत प्रभावशाली ब्राह्मण दुर्वासा के पीछे- पीछे चलने लगे, जो मानो तीनों लोकों को जलाकर भस्म कर देना चाहते थे। उनके कौपीन का आधा ही वस्त्र शेष था। वे बार-बार किसी को याद करते थे, उनके मन में बड़ा संताप था। उन्होंने टूटा हुआ दण्ड धारण कर रखा था। राजा हंसने उन्हें बहुत कष्ट पहुँचाया था, अतः वे भीतर-ही-भीतर रोष से जल रहे थे। उनके नेत्र से महाभयंकर अग्नि प्रकट हो रही थी। वे यादवेश्वर श्रीकृष्ण की ओर देख रहे थे। इस अवस्था में संन्यासी दुर्वासा को उन यादव शिरोमणियों ने भयभीत होकर देखा।

वे मन ही मन सोचने लगे – ‘पता नहीं, यह कुपित होकर क्या करेंगे? और हमारे स्वामी श्रीकृष्ण इन से क्या कहेंगे।’ ऐसा विचार करते हुए वे समस्त यादव और वृष्णिवंशी हाथ जोड़कर उनकी सेवा में उपस्थित हुए और कुछ मन्द स्वर में बोले – ‘भगवन्! आपके लिये यह आसन है।’ इसी समय इन्द्रियों के नियन्ता भगवान् श्रीकृष्ण कुछ उछलकर दुर्वासा के आगे चले आये और बोले- ‘विप्रवर! यह आसन है, इसपर सुख पूर्वक बैठिये। आज मैं आपकी सेवा में खड़ा हूँ, मैं आपका किङ्कर (सेवक) हूँ’। तब वे संन्यासी रूपधारी दुर्वासा उस आसनपर कुछ बैठ-से गये। उनके आसन ग्रहण कर लेनेपर अन्य मात्सर्यरहित संन्यासियों ने भी संतोष पूर्वक यथायोग्य आसन स्वीकार किये।

किरीटधारी श्रीकृष्ण ने अर्घ्य आदि के क्रम से उनका उत्तम आतिथ्य-सत्कार किया, फिर वे भगवान् हृषीकेश उन प्रभावशाली यति दुर्वासा से इस प्रकार बोले- ‘विप्रवर! बताइये, इस नगर में आपलोगोंका शुभागमन किसलिये हुआ है? अथवा आपलोगों को यहाँ आने में कोई महान् कारण दिखायी दिया है ? आपलोग द्विजों में श्रेष्ठ एवं निष्पाप संन्यासी हैं; विप्रवरो ! आपलोग हम-जैसे गृहस्थों से सदा निःस्पृह रहते हैं। आपके लिये कोई प्रार्थनीय वस्तु ही नहीं है; क्योंकि आपलोगों के हृदय में किसी वस्तु की कामना ही नहीं होती है। जो लोग किसी स्पृहा से प्रेरित होकर कर्म करनेवाले हैं वे उत्तम व्रतधारी ब्राह्मण अपनी अभीष्ट वस्तु माँगने के लिये क्षत्रियों के पास जाते हैं। किंतु विप्रवर! हमारे बहुत सोचने-विचारने पर भी कोई ऐसी बात दिखायी नहीं देती, जिसके लिये आपलोगों का यहाँ तक आना सम्भव हो । ब्रह्मन् ! फिर आपके आगमन का क्या कारण है, यह मेरी समझ में नहीं आता। आप यहाँ तक पधारे हैं, इतने से ही यह अनुमान होता है कि आपके शुभागमन का कोई न कोई कारण अवश्य है। यदि है तो आप उसे बताइये। हम आपसे ही उसका ज्ञान प्राप्त करेंगे।

चक्रपाणि जनार्दन के ऐसा कहने पर उन ब्राह्मण दुर्वासा का महान् कोप और भी बढ़ गया। पहले का जो क्रोध था, उससे अधिक और महान् कोप प्रकट होने लगा, मानो वे तीनों लोकों को जला देना और अपनी ओर देखने वाले लोगों को खा जाना चाहते हों। क्रोध से मूच्छित हुए दुर्वासा रोष से लाल आँखें करके क्रोध पूर्वक हँसते और जलाते हुए से उस समय श्रीकृष्ण से इस प्रकार बोले – ‘यादवेश्वर! आप हमसे ऐसी बात क्यों कहते हैं कि आपके आगमनका कारण मेरी समझमें नहीं आता’ मैं आपको जानता हूँ। आप महान् देव विष्णु हैं; फिर भी हमें ठगते हुए-से बात करते हैं। विष्णो ! हम बहुत पुराने हैं और पूर्वकाल के वृत्तान्तों को जानते हैं, जिसके अनुसार हम कहते हैं कि आप देवताओं के भी देवता हैं और आपने माया से मानवशरीर धारण किया है।

जगदीश्वर ! अतः आप हमारे स्वामी होकर हमसे अपने-आपको क्यों छिपा रहे हैं? आप ही ब्रह्मवेत्ताओं के आत्मा हैं। यह परमपद आपका ही स्वरूप है, पूर्वकाल में जिसकी आराधना करके ब्रह्माजी ज्ञानवान् हुए और हम भी जिसकी उपासना करके ज्ञानी हुए हैं। जिससे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट हुआ है, वही आपका यह परम- पद है। विश्वेश्वर! जिसे पूर्वकाल में पुराणवेत्ता पुरुष तत्त्वनिष्ठ चित्तसे स्थूल (विराट्)-रूपसे जानते थे, यह भी आपका ही सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है। जो भगवदर्थ कर्म (भगवान्के समर्पणपूर्वक किये गये यज्ञ आदि के अनुष्ठान अथवा भजन-साधन) से प्राप्त होता है, जिसका स्मरण करके हम वीतराग संन्यासी भी परमानन्द में निमग्न हो जाते हैं तथा प्रेमी भक्तों को जिसका प्रत्यक्ष दर्शन होता है, आपके उस सगुण-साकार (सच्चिदानन्दघन) विग्रह को मूढ-बुद्धि मनुष्य नहीं जानते हैं। देव! हरे! हम वैसे (अज्ञानी) नहीं हैं (हम आपको जानते और पहचानते है, आपके उस सगुण-साकार (सच्चिदानन्दघन) विग्रह को मूढ बुद्धि मनुष्य नहीं जानते हैं। देव! हरे ! हम वैसे (अज्ञानी) नहीं हैं (हम आपको जानते और पहचानते हैं) ! अतः आप हमारे सामने जो यह कहते हैं कि ‘हम आपके आनेका कारण नहीं जानते हैं,’ इससे अधिक साहसपूर्ण बात और क्या हो सकती है ?

देव ! केशिनिषूदन ! जो जड-मूल की बातें जानते हैं, उनके सामने इस प्रकार ऊपर-ऊपर की बातों का विवेचन करने से आपको क्या लाभ होगा? वेदान्त शास्त्र (उपनिषद् आदि) में भी आपके इसी विख्यात तेजोमय स्वरूप का ब्रह्म आदि नामों से विचार किया जाता है। प्रभो! जो विज्ञान से तृप्त निष्पाप योगी जन हैं, वे भी अपने हृदयकमल में आपके इसी स्वरूप का दर्शन करते हैं। वेदों द्वारा ब्रह्म कहकर जिस तेजोमय परमतत्त्व का गान किया जाता है, आपका यह ऐश्वर्यशाली रूप वही है (उस परब्रह्म से अभिन्न ही है), ऐसा मैं जानता हूँ’।

‘विष्णो ! वेदों में ‘तद्विष्णोः परमं पदम्’ इत्यादिरूप से विष्णु के जिस परम तेजोमय तत्त्व का प्रतिपादन किया जाता है, वही आपका यह स्वरूप है – यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ। प्रभो ! विष्णो ! जिस ॐ शब्द का उच्चारण होता है, वह जिनकी वाणी के रूप में गाया जाता है, वे ही परमात्मा आप हैं; अतः आप यह न कहिये कि ‘मैं आपके आने का कारण नहीं जानता’।

गोविन्द ! हरे! यदि आपके लिये कोई भी वस्तु परोक्ष होती तो आपका ऐसा कहना उचित हो सकता था; अतः ‘मैं नहीं जानता’ यह साहसपूर्ण वचन आप मत कहिये। केशव ! पूर्वकाल में यह विश्व जिस से प्रकट हुआ था और संहारकाल में यह फिर जिसमें लीन हो जायगा, वही आपका यह ईश्वरीय तेजोमय विग्रह है, ऐसा मैं जानता हूँ।

भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी हरे! आप ही सब के कर्ता हैं और सदा मेरे हृदय में प्रकाशित होते रहते हैं। मैं जिस-जिस रूप का स्मरण करता हूँ, आप सदा उसी-उसी रूप से मेरे हृदय में विद्यमान हैं। जब मेरी बुद्धि ऐसा निश्चय करती है कि वायु ही विष्णु हैं, तब आप वायुरूप से ही मेरे हृदय में विराजमान होते हैं। प्रभो! जब मेरी बुद्धि कभी इस निश्चय पर पहुँचती है कि आकाश ही विष्णु है, तब आप उसी रूप में मेरे में प्रतिष्ठित होते हैं। जब कभी मेरी बुद्धि का यह निश्चय होता है कि ‘पृथिवी ही विष्णु है’, तब आप सदा मुझे पार्थिवरूप ही प्रतीत होते हैं। जब कभी मैं यह सोचता हूँ कि ‘यह रस ही नारायणदेव है’, तब आप रसरूप से मेरे हृदयमें प्रतिष्ठित होते हैं। पुरुषोत्तम ! जब मैं आपका तेजोरूप से स्मरण करता हूँ, तब आप सदा उसी रूप से सम्पन्न होकर मेरे हृदय में प्रकाशित होते हैं देव! केशव ! जब मैंने ऐसा निश्चय किया कि ‘चन्द्रमा ही श्रीहरि हैं,’ तब मैं चन्द्रमा के रूप में ही आपके स्वरूप का नेत्रों द्वारा दर्शन करके प्रसन्न होता हूँ। पृथ्वीनाथ! जब मैं ऐसा चिन्तन करता हूँ कि ‘यह सूर्यमण्डल ही आपका स्वरूप है,’ तब आप मेरी उस भावना के योग से सूर्यरूप होकर ही विराजमान होते हैं। अतः सब कुछ आप ही हैं, यह मेरी बुद्धि का निश्चय है; इसलिये जनार्दन ! आप यह नहीं कह सकते कि ‘मैं आपलोगों के आने का कारण नहीं जानता’।

विष्णो ! इस सिद्धान्त में प्रतिष्ठित होकर भी आप हमारी पीडा का कुछ विचार नहीं कर रहे हैं। हम अत्यन्त दुःखित होकर आपकी शरण में आये हैं। केशव ! हमारी तो ऐसी दुर्दशा हो रही है और आप इसकी ओर ध्यान ही नहीं देते हैं; इससे हम बार- बार यही सोचते हैं कि हमारा भाग्य ही नष्ट हो गया है। हमलोग बड़े भाग्यहीन हैं, क्योंकि आप हमारा स्मरण नहीं करते हैं।

जनार्दन ! कोई दो क्षत्रिय कुमार हैं, जो भगवान् शङ्करका वर पाकर घमंड में भर गये हैं। उन दोनों के नाम हंस और डिम्भक हैं। केशव ! वे दोनों यह कहते हुए कि गृहस्थ आश्रम ही सदा श्रेयस्कर है, हमें सताने लगे हैं। वे इधर-उधर दौड़ते, बहुत-सी पापपूर्ण बातें मुँह से निकालते और बहुत-सा अनुचित भाषण करते हुए सदा हमारा तिरस्कार करते हैं। देव! उन दोनों ने जो दूसरा असह्य अपराध किया है, उसे बताया जाता है – देखिये ! ये जो हमारे सहस्रों छींके, लकड़ीके पात्र, द्विदल और बहुत-से बाँसके पिटारे आदि हैं, इन सब के उन्होंने अनेकानेक टुकड़े कर डाले हैं। उन दोनोंकी यह दूसरी दुःसाहसपूर्ण चेष्टा देखिये- हमारा जो कौपीन था, उसके भी उन्होंने चीथड़े-चीथड़े कर डाले हैं; वह कौपीन ही हमारा महान् धन है। जगदीश्वर ! उन्होंने हमारे कमण्डलु को भी तोड़ – फोड़कर कपाल (खपड़े या खप्पर) का रूप दे दिया है। आप क्षत्रिय धर्म का आश्रय लेकर सदा हम सबकी रक्षा करते हैं तो भी हमारी यह दशा हो गयी। यह बड़ी विचित्र और अद्भुत बात है। आप निरन्तर रक्षा करते हैं और सदा सर्वत्र विद्यमान भी हैं तो भी हमारी रक्षा न हो सकी । प्रभो ! मेरी बुद्धि मन्द है। मैं क्या करूँ ? हम सबलोग बड़े भाग्यहीन हैं। जगत्पते ! इस समय हम किस की शरण में जायँ, यह बताइये। यदि वे दोनों जीवित रह गये तो ये तीनों लोक नष्ट हो जायँगे। न ब्राह्मण बचेंगे न क्षत्रिय, न वैश्य रह जायँगे और न शूद्र। वे दोनों अत्यन्त बलवान्, मदमत्त और कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं; उन दोनों के सामने इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी टिक नहीं सकते ‘। ‘न भीष्म और न भयंकर पराक्रमी राजा बाह्रीक ही उन दोनों का सामना कर सकते हैं। श्रीकृष्ण ! हरे ! क्षत्रियों के लिये भयंकर जो वीर जरासंध है, वह भी प्रायः उन दोनों के सामने नहीं ठहर सकता; क्योंकि भगवान् शङ्कर के वरदान से उनका गर्व बहुत बढ़ गया है। वे सदा एक-दूसरे के साथ रहते हैं। उनमें कभी पार्थक्य अथवा विरोध नहीं होता।

इसलिये आप ही उन दोनों वीरोंका वध कीजिये और इन तीनों लोकोंको विनाशसे बचाइये; अन्यथा ‘आप रक्षा करते हैं’ यह कथन यहाँ व्यर्थ हो रहा है। यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ ? आप तीनों लोकों की रक्षा कीजिये ! रक्षा कीजिये !!’ ऐसा कहकर क्रोध से मूर्छित हुए दुर्वासा चुप हो गये।

यति का यह वचन सुनकर यादवेश्वर श्रीकृष्ण ने धीरे से उच्छ्वास लेकर दुर्वासा की ओर देखा और इस प्रकार कहना आरम्भ किया – ‘भगवन्! अब जो कुछ हो गया, उस सबके लिये आप क्षमा करें; वास्तव में यह मेरा ही दोष है। आप मेरी यह बात सुनें और सुनकर शान्त हो जायँ। विप्रवर! मैं हंस और डिम्भक को युद्ध में पराजित करूँगा। उन्हें भगवान् शङ्कर, इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण अथवा चतुर्मुख ब्रह्मा कोई भी वर क्यों न दे, मैं सेना और बन्धु-बान्धवों सहित उन दोनों का वध करके पुनः आपलोगों को प्रसन्नता प्रदान करूँगा। आज मैं सत्य की ही शपथ लेकर कहता हूँ कि आप रोष के वशीभूत न होइये। मैं उन दोनों नीच नरेशों का वध करके आपलोगों की रक्षा करूँगा’।

‘मैं उन दोनों दुरात्माओं को जानता हूं, उन्ही दोनों ने आपलोगों का अपराध किया है। मैंने पहले से ही सुन रखा है कि वे दोनों कठोर दण्ड धारण करने वाले हैं, अत्यन्त बलवान् और मदमत्त हैं। भगवान् शङ्करका वर पाने से उनका घमंड बढ़ा हुआ है। थोड़े-से प्रयत्न द्वारा उन्हें वश में नहीं किया जा सकता। वे जरासंध के हितैषी हैं। इसमें संदेह नहीं कि राजा जरासंध उन दोनोंके लिये अपने प्राण भी दे डालेगा; क्योंकि उन दोनों के बिना राजा जरासंध इस पृथ्वी पर विजय नहीं पा सकता। विप्रवर! उन दोनों को पराजित करते समय उन्हें वहाँ जरासंध की ओर से श्रेष्ठ सहायता प्राप्त हो सकती है तो भी वे दोनों जहाँ-जहाँ जाकर खड़े होंगे और इसका समाचार हम सुन लेंगे, वहाँ-वहाँ पहुँचकर मैं उन दोनों का वध करूँगा, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। संन्यासियो ! आपलोग अपने कर्तव्य – पालन में तत्पर रहकर जहाँ चाहें इच्छानुसार जायँ। मैं थोड़े ही समयमें उन रणकुशल वीरों को परास्त करूँगा।’

तब प्रेमपूर्वक प्रसन्नचित्त हो दुर्वासा ने यादवेश्वर श्रीकृष्ण से कहा- ‘श्रीकृष्ण! तीनों लोकों का कल्याण करनेवाले आपका मङ्गल हो। जगन्नाथ! केशव ! कौन-सा ऐसा कार्य है, जो आपके लिये दुष्कर हो। त्रिलोकीनाथ! आप त्रिधामा हैं। आप ही सबका संहार करने वाले हैं, देवताओं के भी देवेश्वर हैं। आपकी सर्वत्र समान दृष्टि है। विष्णो ! देव ! हरे ! कृष्ण ! हाथमें चक्र धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। आप स्वभावसे शुद्ध हैं, शुद्धस्वरूप हैं तथा शौच, संतोष आदि नियमोंसे सम्पन्न एवं सर्वव्यापी हैं । देवेश्वर ! आप ही वैदिक शब्दोंके चरम तात्पर्य हैं। भक्तवत्सल! आपको मेरा नमस्कार है। मैंने जानकर अथवा अनजान में जो अनुचित बात कह दी हो, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें । जगन्नाथ! मैं आपका ही स्वरूप हूँ। हम दोनों में कोई भेद या पार्थक्य नहीं है। अतः भगवन्! आप मुझे क्षमा करें; क्योंकि साधुपुरुषों का सारत्तत्त्व क्षमा ही है’।

श्रीभगवान् बोले – विप्रवर! क्षमा तो आपको करनी चाहिये। हमलोग तो सदा आप महापुरुषों की ही क्षमा का आश्रय लेनेवाले हैं। संन्यासियों का सार तत्त्व क्षमा ही है। क्षमा ही उनका उत्तम बल है। ब्रह्मन् ! क्षमा तत्त्वज्ञान की भाँति सदा ही मोक्ष प्रदान करनेवाली है। क्षमा धर्म, क्षमा सत्य, क्षमा दान और क्षमा यश है। वेदज्ञ पुरुष ऐसा मानते हैं कि क्षमा ही स्वर्ग की सीढ़ी है। अतः आप लोग पूरा प्रयत्न करके अपने क्षमाधर्म का पालन करें। यतीश्वरो ! आप सब लोग प्रत्यक्ष ज्ञान से संयुक्त हैं। यहाँ जो यति – ब्राह्मण पधारे हैं, उन सबका आज मुझे पूजन करना है। यतिधर्म में तत्पर रहनेवाले इन सभी भिक्षु ब्राह्मणों को भोजन भी कराना है। तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर उन सबने भगवान्के भवन में भिक्षा ग्रहण करने का विचार किया। तदनन्तर सर्वेश्वर विष्णु हरिने अपने भवनके भीतर प्रवेश करके विधिपूर्वक चार प्रकार की भोजन – सामग्री तैयार करायी (खाने, पीने, चाटने और चूसने के भेदसे चार प्रकार की भोजन-सामग्री होती है) और उन समस्त यतियों को भोजन कराया। उस समय यतिश्रेष्ठ दुर्वासा ने श्रीकृष्ण का सम्मान किया। श्रीकृष्ण ने उस समय कोमल वस्त्र फाड़-फाड़कर उन सब संन्यासियों के लिये कौपीन आदि बनाने के लिये दिया। वे उन्हें पूर्ववत् यथायोग्य पाकर बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् सब लोग वहाँ से चले गये।

शेष अगले भाग में…

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